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UP Board Class 12 Chemistry Chapter 5 Most Important Questions – Coordination Compounds

Class 12 Chemistry Chapter 5 Important Questions

 महत्त्वपूर्ण परिभाषाएं

▶ वे योगात्मक यौगिक जो ठोस एवं जलीय विलयन दोनों में स्थायी होते हैं, उपसहसंयोजन यौगिक या संकुल कहलाते हैं।

▶ वे परमाणु, अणु या आयन जो उपसहसंयोजन यौगिक में केन्द्रीय घातु परमाणु को इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करके उससे उपसहसंयोजन आबन्ध बनाते है, लिगेण्ड कहलाते हैं।

लिगेण्डों का वर्गीकरण ऋणावेशित, उदासीन तथा धनावेशित लिगेण्डों (आवेश के आधार पर) तथा एकदन्तुक, द्विदन्तुक, त्रिदन्तुक, चतुःदन्तुक, पंचदन्तुक, षट्दन्तुर, उभयदन्तुक तथा सेतु आबन्ध लिगेण्ड (संयोजकता के आधर पर) के रूप में किया जाता है।

▶ उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण IUPAC पद्धति द्वारा किया जाता है।

▶ उपसहसंयोजन यौगिक संरचनात्मक समावयवता (बहुलीकरण, आयनन, जलयोजन, बन्धक, उपसहसंयोजक या समन्वयी, उपसहसंयोजक-स्थान समावयवता) तथा त्रिविम समावयवता (ज्यामितीय तथा प्रकाशिक समावयवता) प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 1- लिगेण्ड क्या है तथा आवेश के आधार पर इन्हें किस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है? दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर : लिगेण्ड द्वितीयक संयोजकता द्वारा केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के चारों ओर आन्तरिक क्षेत्र (उपसहसंयोजक परिसर) में समन्वित उदासीन अणु जैसे NH3 , H2O आदि अथवा परमाणु या आयन, लिगेण्ड कहलाते हैं। उदाहरण- -[Cu (NH3) 4 ]^ + संकुल आयन में चार NH3 अणु लिगेण्ड हैं। अधिकांश संकुलों में लिगेण्ड एक दाता के रूप में अर्थात् लुईस क्षारक के रूप में कार्य करते हैं अर्थात् वे केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन को एक या अधिक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म देते हैं।

लिगेण्डों का वर्गीकरण- आवेश के आधार पर इन्हें तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

1. ऋणावेशित लिगेण्ड- सामान्यतया लिगेण्ड ऋणावेशित होते हैं। उदाहरण- C l, Br-

, I – OH-, CN-, No2- आदि।

2. उदासीन लिगेण्ड-कुछ लिगेण्ड उदासीन होते हैं अर्थात् उन पर कोई आवेश नहीं होता है। उदाहरण – H2O, NH3 CO, RO, NO, पिरिडीन (C5H5N) आदि।

3. धनावेशित लिगेण्ड- ये लिगेण्ड दुर्लभ होते हैं। इन पर धनावेश होता है। उदाहरण- NO^+ ,NH2 –

NH 3 + , H3O+ आदि।

प्रश्न 2- कीलेट प्रभाव से क्या तात्पर्य है?

उत्तर : जब एक द्विदन्तुर या बहुदन्तुर लिगेण्ड में दाता परमाणु इस प्रकार स्थित होते हैं कि जब वे केन्द्रीय धातु आयन के साथ उपसहसंयोजित होते हैं, तब एक पाँच या छह सदस्यीय वलय बनती है तो यह प्रभाव कीलेट प्रभाव कहलाता है।

प्रश्न 3- सिडविक के प्रभावी परमाणु क्रमांक नियम की  व्याख्या कीजिए।

               अथवा

 प्रभावी परमाणु क्रमांक क्या है? 

उत्तर : प्रभावी परमाणु क्रमांक का सिद्धान्त सर्वप्रथम सिडविक ने संकुलों के स्थायित्व की व्याख्या करने के लिए दिया। इसके अनुसार “लिगेण्ड्स से इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करने के पश्चात् केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन पर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या, उस धातु का प्रभावी परमाणु क्रमांक (EAN) कहलाती है।” सामान्यतः यह निकटतम अक्रिय गैस के बराबर होती है। अतः EAN = केन्द्रीय धातु परमाणु का परमाणु क्रमांक – उस धातु द्वारा त्यागे इलेक्ट्रॉनों की संख्या (ऑ० सं०) + लिगेण्डों से ग्रहण इलेक्ट्रॉनों की संख्या (2x समन्वय संख्या) l

प्रश्न 4- उपसहसंयोजी यौगिकों के IUPAC पद्धति में नामकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर : उपसहसंयोजी यौगिकों के IUPAC पद्धति में नामकरण हेतु निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाता है-

1. साधारण लवणों के समान उपसहसंयोजन यौगिकों में भी सर्वप्रथम धनायन का नाम लिखा जाता है तत्पश्चात् ऋणायन का नाम लिखा जाता है। संकुल भाग का नाम एक साथ लिखा जाता है। इसमें घनायन अथवा ऋणायन की संख्या का उल्लेख नहीं किया जाता है। उदाहरण- [PtCl4 (NH3)2] का नाम डाइऐम्मीनटेट्राक्लोरिडोप्लैटिनम (IV) है।

2. संकुल स्पीशीज के नामकरण का क्रम इस प्रकार होता है-लिगेण्ड का नाम, केन्द्रीय धातु परमाणु/आयन का नाम, धातु परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था (रोमन में), जैसे [Cr(H2O)6]3+ संकुल आयन का नाम हेक्साऐक्वाक्रोमियम (III) आयन होगा।

3. यदि दो अथवा भिन्न-भिन्न प्रकार के लिगेण्ड उपस्थित हों तब लिगेण्ड के नामकरण का क्रम निर्धारित करने हेतु इन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है लेकिन पूर्वलग्न डाइ, ट्राइ, टेट्रा आदि पर कोई विचार नहीं किया जाता है, बल्कि लिगेण्ड के नाम के पहले अक्षर का उपयोग किया जाता है, जो लिगेण्ड कीलेट बनाते हैं अथवा जिनमें लिगेण्ड के नाम में डाइ, ट्राइ आदि पूर्वलग्न पहले से लगे होते हैं, उनकी संख्या के लिए बिस, ट्रिस, टेट्राकिस आदि का प्रयोग किया जाता है, जैसे (en)2 का नामकरण बिस (एथेन-1, 3-डाइऐमीन) के रूप में किया जाता है।

4. IUPAC के नवीनतम संशोधन के अनुसार, Cl – Br- I-, F- के अन्त में ‘ide’ होता है, इनमें ‘ide’ का ‘e’ को हटाकर क्लोराइडो, ब्रोमाइडो, आइडाइडो व फ्लुओराइडो लिखा जाता है। हाइड्रोजन लिगेण्ड के रूप में सदैव हाइड्राइड (ऋणायन) होता है जिसको हाइड्राइडो लिखते हैं। यद्यपि CN को साइनो ही लिखा जाता है।

5. उदासीन लिगेण्डों का नामकरण इस प्रकार किया जाता है- जल (ऐक्वा), कार्बन मोनोऑक्साइड (कार्बोनिल), अमोनिया (ऐम्मीन) आदि।

6. धनावेशित लिगेण्डों का अनुलग्न ‘ium’ होता है, जैसे अमोनियम आयन ( NH4+ ) का नाम अमोनियम लिखा जाएगा।

प्रश्न 5- जैविक निकायों में उपसहसंयोजक यौगिक के महत्त्व उदाहरण द्वारा समझाइए।

                अथवा 

जैविक निकायों में उपसहसंयोजन यौगिकों के दो महत्त्वपूर्ण उपयोग लिखिए।

उत्तर : जैविक निकायों में उपसहसंयोजक यौगिकों का महत्त्व – जैविक निकायों में भाग लेने वाले बहुत से यौगिक उपसहसंयोजक यौगिक होते हैं। ऐसे कुछ यौगिकों का वर्णन निम्न प्रकार है-

(i) हीमोग्लोबिन-हीम (haem), हीमोग्लोबिन का एक भाग है और रक्त में लाल वर्णक के रूप में उपस्थित होता है। यह Fe2+ आयन का पोरफायरिन संकुल है, जो चार N परमाणुओं व जल के अणु के साथ उपसहसंयोजी आबन्ध बनाता है। जल का अणु ऑक्सीजन द्वारा उत्क्रमणीय रूप में विस्थापित हो सकता है, जिससे ऑक्सीहीमोग्लोबिन प्राप्त होता है।

हीमोग्लोबिन+ O2 → ऑक्सीहीमोग्लोबिन H2O 

ऑक्सीजन के दाब के फलस्वरूप उक्त साम्य विस्थापित हो सकता है। ऑक्सीजन द्वारा मनुष्य के फेफड़ों में रक्त संतृप्त होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। रक्त ऊतकों की वाहिनियों में बहने के साथ-साथ दाब कम होने लगता है जिससे बन्धित ऑक्सीजन मुक्त होने लगती है। अतः यह जीव-जन्तुओं की कोशिकाओं को ऑक्सीजन पहुँचाता है।

(ii) क्लोरोफिल- यह हरे पौधों में उपस्थित हरे रंग का वर्णक है। यह Mg2+ का एक संकुल है। यह पेड़-पौधों में होने वाली प्रकाश-संश्लेषी प्रक्रिया में सहायक है।

(iii) विटामिन B12 (सायनोकोबालेमिन)- यह Co2+ का संकुल यौगिक है। यह एनीमिया रोग में काम आता है।

(iv) कार्बोडाइपेप्टिडेज-A- यह एक एन्जाइम तथा संकुल यौगिक है, जिसमें Zn2+ आयन केन्द्रीय धातु आयन होता है।

प्रश्न 6- संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।

उत्तर : संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की मुख्य अभिधारणाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सर्वप्रथम केन्द्रीय धातु परमाणु अपनी ऑक्सीकरण संख्या के अनुरूप इलेक्ट्रॉन त्यागकर (शून्य ऑक्सीकरण संख्या को छोड़कर) धनायन बनाता है। संकुल यौगिकों में केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के पास उचित लिगेण्डों के साथ उपसहसंयोजक आबन्ध बनाने के लिए आवश्यकतानुसार रिक्त कक्षक होते हैं। ये रिक्त कक्षक केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन की समन्वय (उपसहसंयोजन) संख्या के बराबर होते हैं।

(2) केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के ये रिक्त कक्षक (s, p या d) संकरित होकर समान संख्या में समान ऊर्जा के नए संकरित कक्षक देते हैं। इन संकरित कक्षकों की ज्यामिति निश्चित होती है, जो समतली वर्गाकार, चतुष्फलकीय, अष्टफलकीय आदि हो सकती है।

ये रिक्त संकरित कक्षक, लिगेण्ड के दाता परमाणु के इलेक्ट्रॉन युग्म कक्षकों से अतिव्यापन करके, उपसहसंयोजन आबन्ध बनाते हैं। इस प्रकार केन्द्रीय धातु आयन संकरित कक्षक और लिगेण्ड के मध्य बने संकुल अणु या आयन की एक निश्चित ज्यामिति होती है।

(3) केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के संकरण में भाग लेने वाले d-कक्षक अन्दर के अर्थात् (n – 1) d या बाह्यतम nd कक्षक हो सकते हैं। उदाहरणार्थ-अष्टफलकीय संकरण में भाग लेने वाले कक्षक दो (n-1)d, एक ns तथा तीन np (d² sp³ के रूप में) अथवा एक ns, तीन np तथा दो nd (sp³d² के रूप में) हो सकते हैं।

4) अन्दर वाले d-कक्षकों का प्रयोग करने वाले संकुल यौगिकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होती है। इन्हें आन्तरिक कक्षक, निम्न चक्रण या चक्रण युग्मित जटिल यौगिक (संकुल) कहते हैं। बाह्यतम d-कक्षकों का प्रयोग करने वाले संकुल यौगिकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। इन्हें बाह्यतम कक्षक, उच्च चक्रण या चक्रण मुक्त (spin free) संकुल यौगिक कहते हैं।

(5) प्रत्येक लिगेण्ड के पास कम-से-कम एक कक्षक होता है जिसमें एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होता है जो धातु के रिक्त संकरित कक्षक के साथ अतिव्यापन करके धातु-लिगेण्ड उपसहसंयोजन आबन्ध बनाता है।

(6) लिगेण्डों के केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के निकट आने पर केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के रिक्त संकरित कक्षक लिगेण्ड के भरे हुए कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके लिगेण्ड व धातु के बीच उपसहसंयोजन आबन्ध बनाते हैं। इन आबन्धों की संख्या केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के द्वारा उपलब्ध रिक्त कक्षकों की संख्या पर निर्भर करती है।

(7) केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन के अन्दर वाले कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आबन्ध बनाने में भाग नहीं लेते हैं।

(8) यदि लिगेण्ड प्रबल इलेक्ट्रॉन युग्म दाता है तो यह धातु आयन के इलेक्ट्रॉन का पुनर्विन्यास (हुण्ड नियम के विरुद्ध) करके, अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को युग्मित कर देता है, जिससे अधिक संख्या में रिक्त d-कक्षक संकरण में भाग लेने को उपलब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार इलेक्ट्रॉन के युग्मन से चुम्बकीय आघूर्ण कम हो जाता है, जिससे बनने वाले संकुल को निम्न चक्रण संकुल या आन्तरिक कक्षक संकुल या चक्रण युग्मित संकुल कहते हैं।

प्रबल लिगेण्ड-

NCS < Py < NH3 <en < bipy <NO2 <CN<CO इसके विपरीत जब दुर्बल इलेक्ट्रॉन युग्म दाता होता है तो वह धातु के आयन के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का युग्मन नहीं कर सकता। अतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या अधिक होने से चुम्बकीय आघूर्ण अधिक हो जाता है। इस स्थिति में बाह्य कक्षक (d) प्रयुक्त होता है जिससे बनने वाले संकुल को उच्च चक्रण संकुल या बाह्य कक्षक संकुल या चक्रण मुक्त संकुल कहते हैं।

दुर्बल लिगेण्ड -I<Br^ – <Cl^ – <NO 3 ^ – <F^ – <OH^ – < C2H5OH <C 2 O 4 ^ 2- < H2O

अतः आन्तरिक कक्षकों के प्रयुक्त होने पर बनने वाले संकुल निम्न चक्रण संकुल तथा बाहरी कक्षकों के प्रयुक्त होने पर बनने वाले संकुल उच्च चक्रण संकुल कहलाते हैं।

(9) यदि संकुल यौगिक में एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं तो यह अनुचुम्बकीय होता है तथा यदि सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं तो यह प्रतिचुम्बकीय होता है।

प्रश्न 7- संयोजकता बन्ध सिद्धान्त की क्या सीमाएँ हैं?

उत्तर : (1) यह सिद्धान्त केन्द्रीय धातु व लिगेण्डों के गुणों में परिवर्तन की व्याख्या नहीं करता है।

(2) यह सिद्धान्त केवल केन्द्रीय धातु के कक्षकों पर ध्यान केन्द्रित करता है और लिगेण्डों की महत्ता को स्वीकार नहीं करता है।

(3) यह विभिन्न संरचनाओं की तुलनात्मक (आपेक्षिक) ऊर्जाओं की व्याख्या नहीं करता है।

(4) समन्वय संख्या 4 वाली धातु से बने संकुल चतुष्फलकीय होगा या वर्ग समतली इस प्रकार की कोई भविष्यवाणी यह सिद्धान्त नहीं करता है।

(5) यह सिद्धान्त संकुल यौगिकों या आयनों के स्पेक्ट्रम रंग की व्याख्या नहीं करता है।

(6) यह सिद्धान्त एक ही धातु से बने विभिन्न संकुलों में अणु की ज्यामिति की प्रभावी व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता है। कुछ संकुलों में धातुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास स्थिर रहता है, परन्तु कुछ संकुलों में हुण्ड के बहुलकता नियम का उल्लंघन करके अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युग्मित हो जाते हैं।

(7) यह सिद्धान्त आन्तरिक कक्षक और बाह्यतम कक्षक संकुलों की कोई सन्तोषजनक व्याख्या नहीं करता है।

(8) कुछ संकुल परिवर्तनशील होते हैं और इनमें एक लिगेण्ड को दूसरे लिगेण्ड से विस्थापित कर सकते हैं, परन्तु कुछ संकुल अक्रियाशील होते हैं और इनमें लिगेण्ड का विस्थापन सरल नहीं है। कोई संकुल स्थायी और कुछ कम स्थायी होते हैं इसकी व्याख्या भी यह सिद्धान्त नहीं करता है।

प्रश्न 8 – उपसहसंयोजन यौगिकों के सन्दर्भ में क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त को समझाइए।

          अथवा

उपसहसंयोजन यौगिकों में क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (CFT) को समझाइए तथा इसकी सीमाओं को लिखिए।

उत्तर: क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (CFT) – वैज्ञानिक एच० बैथे (H. Bethe) (1929) तथा वी० ब्लैक (Van Vleck) द्वारा सन् 1932 में उपसहसंयोजन यौगिकों के उक्त गुणों को स्पष्ट करने हेतु एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया था जिसे क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (CFT) कहा गया, जो सन् 1950 में लागू हुआ। यह सिद्धान्त एक स्थिर वैद्युत मॉडल है। इस सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु निम्न प्रकार से हैं-

(1) संक्रमण धातु संकुल के केन्द्रीय आयन का कार्य करती है। लिगेण्ड एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करता है, जबकि संक्रमण धातु आयन के रिक्त कक्षक इन इलेक्ट्रॉन युग्मों को ग्रहण करते हैं।

(2) लिगेण्ड (ऋणात्मक/द्विध्रुवी) बिन्दु आवेश की तरह माने जाते हैं।

(3) संकुल यौगिकों में धातु आयन व लिगेण्ड के मध्य बनने वाले आबन्ध को पूर्णतया आयनिक माना जाता है अर्थात् धातु आयन व लिगेण्ड परस्पर स्थिर वैद्युत आकर्षण बल द्वारा जुड़े रहते हैं।

(4) यह स्थिर विद्युत आकर्षण बल धनायन व ऋणायन के मध्य आयन-आयन आकर्षण बल हो सकता है या धनायन व उदासीन लिगेण्ड के मध्य आयन-द्विध्रुव आकर्षण बल हो सकता है।

(5) केन्द्रीय धातु के इलेक्ट्रॉन लिगेण्ड के इलेक्ट्रॉनों से प्रतिकर्षण बल का अनुभव करते हैं। इस प्रकार इलेक्ट्रॉन लिगेण्ड की पहुँच की दिशा में अधिकतम दूरी पर स्थित d-कक्षकों में स्थान प्राप्त करते हैं अर्थात् d-कक्षक की विकृति या अपभ्रंशता (degeneracy) समाप्त हो जाती है जिसके कारण वे अलग-अलग ऊर्जा रखते हैं।

6) क्रिस्टल क्षेत्र का निर्धारण- (i) अभिक्रिया करने वाले लिगेण्डों की संख्या के आधार पर, (ii) केन्द्रीय धातु आयन की ज्यामिति या लिगेण्ड के विन्यास के आधार पर होता है।

(7) लिगेण्ड का प्रभाव विशेष रूप से d-कक्षकों के इलेक्ट्रॉनों पर चिह्नित होता है और केन्द्रीय धातु के चारों और उनकी संख्या और व्यवस्था पर निर्भर करता है।

(8) संक्रमण धातु संकुल के रंगों की व्याख्या विभिन्न ऊर्जा वाले विभिन्न d-कक्षकों के मध्य संक्रमण के रूप में की जा सकती है।

(9) यह सिद्धान्त विभिन्न क्रिस्टल क्षेत्रों (crystal fields) में d-कक्षकों के विपाटन (splitting) के रूप में चुम्बकीय गुणों की व्याख्या कर सकता है। यदि -कक्षक का क्रिस्टल विपाटन अधिक होगा तो उसका चुम्बकीय गुण कम होगा क्योकि अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होगी।

(10) विभिन्न क्रिस्टल क्षेत्र पाँच d-कक्षकों की आपेक्षिक (relative) ऊर्जा पर भिन्न-भिन्न प्रभाव रखते हैं, जो भिन्न-भिन्न लिगेण्डों के लिए भिन्न-भिन्न होती है।

(11) यह सिद्धान्त क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (crystal field stabilization energy, CFSE) के रूप में इस बात की व्याख्या कर सकता है कि कोई धातु अपने संकुलों में अन्य ज्यामितियों की तुलना में किसी विशेष ज्यामिति का अधिक अनुमोदन (favour) क्यों करती है।

क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त की सीमाएँ (Limitations of Crystal Field Theory)-

(1) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त केवल d-कक्षकों के धातु आयन पर विचार करता है और अन्य धातु कक्षकों; जैसे-s, px , py व pz. कक्षकों तथा लिगेण्ड-कक्षकों पर कोई विचार नहीं अतः यह संकरों में -आबन्धन पर विचार नहीं करता है।

(2) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के अनुसार धातु और लिगेण्डों के मध्य आबन्ध विशुद्ध आयनिक होते हैं। धातु लिगेण्ड आबन्धों की आंशिक सहसंयोजकता पर विचार नहीं किया जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉन चक्रण अनुनाद (electron spin resonance) स्पेक्ट्रम के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि धातु-लिगेण्ड आबन्ध का लगभग 70% आयनिक और 30% सहसंयोजक होता है। अतः यह वैद्युत स्थैतिक अन्तः क्रिया पर आधारित है परन्तु धातु की शून्य ऑक्सीकरण अवस्था वाले संकुलों में यह कल्पना व्यर्थ सिद्ध होती है।

(3) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त लिगेण्डों के आपेक्षिक सामर्थ्य का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। यह सिद्धान्त इस बात का भी स्पष्टीकरण नहीं दे सकता कि स्पेक्ट्रमी रसायन श्रेणियों के अनुसार OH आयन की अपेक्षा H2O क्यों एक प्रबल लिगेण्ड है।

(4) संकुलों में ज-आबन्ध पर भी यह सिद्धान्त विचार नहीं करता है।

अतः यह सिद्धान्त लिगेण्ड तथा केन्द्रीय परमाणु के मध्य आबन्ध की सहसंयोजक प्रवृत्ति का संज्ञान नहीं लेता है।

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