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Class 12 Chemistry Chapter 2 Important Questions in Hindi | रसायन विज्ञान प्रश्नोत्तर

 


Class 12 Chemistry Chapter 2 Important Questions in Hindi

प्रश्न 1- एक उदाहरण द्वारा अर्द्ध-सेल की व्याख्या कीजिए l

उत्तर: किसी धातु इलेक्ट्रोड को जब किसी विद्युत अपघट्य के विलयन में रखा जाता है तो धातु (इलेक्ट्रोड) तथा धातु के आयनों के मध्य एक साम्य स्थापित हो जाता है। साम्य की इस युक्ति को अर्द्ध-सेल कहते हैं। उदाहरण-जिंक धातु की छड़ (इलेक्ट्रोड) को जब जिंक सल्फेट विलयन (धातु के लवण का विलयन अर्थात् विद्युत अपघट्य) में रखा जाता है, तो जिंक धातु (इलेक्ट्रोड) का आयन विलयन में जाने का प्रयास करता है। धातु इलेक्ट्रोड (Zn) से दो आयन (इलेक्ट्रॉन) निकल जाने पर धन आवेश आ जाता है और धातु इलेक्ट्रोड घन-आवेशित हो जाता है। यह युक्ति अर्द्ध-सेल का कार्य करती है।

       Zn(s) → Zn²+(aq) + 2e-

प्रश्न 2- मानक इलेक्ट्रोड विभव की परिभाषा एवं नेर्स्ट समीकरण लिखिए।

               अथवा

 मानक इलेक्ट्रोड विभव क्या है? इलेक्ट्रोड विभव (E) और मानक इलेक्ट्रोड विभव (E°) में सम्बन्ध लिखिए।

उत्तर: 25⁰C ताप पर जब किसी धातु को उसके किसी लवण के 1 मोलर विलयन में डाला जाता है, तो विलयन में धातु एवं धातु आयनों के मध्य उत्पन्न विभवान्तर को उस धातु का मानक इलेक्ट्रॉड विभव कहते हैं। इसको E⁰ से व्यक्त करते हैं। इसका मात्रक वोल्ट होता है।

M(s) → Mn+ (aq) +ne – (. ऑक्सीकरण  )

या Mn+ (aq) +ne – → M(s) (. अपचयन ) 

वह समीकरण जो किसी धातु इलेक्ट्रोड के इलेक्ट्रोड विभव का उस धातु के लवण विलयन की सान्द्रता तथा ताप के साथ परिवर्तन व्यक्त करती है, नेर्स्ट समीकरण कहलाती है।

प्रश्न 3 -सिल्वर नाइट्रेट के घोल में कॉपर की छड़ डुबोने पर घोल का रंग नीला क्यों हो जाता है? व्याख्या कीजिए l

उत्तर : विद्युत रासायनिक श्रेणी में कॉपर का स्थान सिल्वर से नीचें है जिस कारण कॉपर की ऑक्सीकृत होने की प्रवृत्ति सिल्वर से अधिक होती है। इसके अतिरिक्त Ag+ आयनों की अपचयित होने की प्रवत्ति Cu2+ आयनों से अधिक होती है। इसलिए कॉपर सिल्वर नाइट्रेट विलयन से सिल्वर को विस्थापित कर देता है।

Cu(s) + 2AgNO3(aq) → Cu(NO3)2(aq) + 2Ag(s) अतः कॉपर नाइट्रेट बनने के कारण घोल का रंग नीला हो जाता है।

प्रश्न4- क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक क्यों होती हैं?

उत्तर : सभी क्षार धातुएँ विद्युत-रासायनिक श्रेणी में निम्नतम स्थान पर स्थित हैं, क्योंकि इनके मानक इलेक्ट्रोड विभव के मान उच्च (ऋणात्मक) होते हैं, फलस्वरूप इनकी इलेक्ट्रॉन दान करके धनायन बनाने की प्रवृत्ति भी अधिक होती है, जिसके कारण ये प्रबल अपचायक होती हैं।

प्रश्न 5- मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड विभव को समझाइए।

उत्तर : मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड में, मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड को एक मोलर सान्द्रण वाले हाइड्रोजन आयन विलयन (1.0M HCI) में डुबो दिया जाता है। इस विलयन में एक वायुमण्डल दाब पर शुद्ध हाइड्रोजन गैस की कुछ मात्रा प्लैटिनम की सतह पर अधिशोषित हो जाती है तथा शेष अम्ल के मोलर विलयन में विलीन हो जाती है। इस कारण प्लैटिनम इलेक्ट्रोड पर अधिशोषित हाइड्रोजन गैस तथा विलयन में विद्यमान हाइड्रोजन आयनों के मध्य साम्य स्थापित हो जाता है।

H2(g) → 2H(aq) +2e^ –

या H2(g)Pt| H(aq) (या HCl)

इसको निम्नांकित प्रकार से भी व्यक्त कर सकते है  2H (aq) +2e^ – → H2(g) या H+(aq)

इस इलेक्ट्रोड का स्वेच्छा से इलेक्ट्रोड विभव शून्य निर्धारित कर दिया जाता है। यह इलेक्ट्रोड हाइड्रोजन के मानक इलेक्ट्रोड विभव का कार्य करता है।

प्रश्न 6-विद्युत लेपन को उदाहरण द्वारा संक्षेप में समझाइए।

[यह प्रश्न बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ]

उत्तर : विद्युत लेपन-किसी धातु के संक्षारण से बचाव के लिए अथवा इसकी सुन्दरता (चमक) को बढ़ाने के लिए, किसी अन्य धातु का इसकी सतह पर विद्युत की सहायता से लेपन करने का प्रक्रम विद्युत लेपन कहलाता है। यह मुख्यतः धातु के पृष्ठ (सतह) के गुणों को परिवर्तित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। विद्युत लेपन को विद्युत निक्षेपण भी कहते हैं।

इस विधि में साधारणतः सक्रिय धातुओं पर कम सक्रिय धातुओं का लेपन किया जाता है। इसके द्वारा कॉपर, लोहा आदि धातुओं पर गोल्ड, चाँदी, क्रोमियम

निकिल आदि की पतली परत चढ़ा सकते हैं।

प्रक्रिया-विद्युत लेपन के प्रक्रम में जिस धातु का लेपन करना होता है, उसे ऐनोड बनाते हैं तथा जिस वस्तु पर लेपन करना होता है, उसे कैथोड बनाते हैं। लेपन के लिए प्रयुक्त धातु के लवण का विलयन, विद्युत-अपघट्य का कार्य करता है।

उदाहरण-चाँदी का लेपन करने के लिए सिल्वर नाइट्रेट तथा सोडियम सायनाइड का जलीय विलयन लिया जाता है। यह विलयन विद्युत अपघट्य का कार्य करता है। जिस छड़ पर लेपन करना होता है उसे कैथोड तथा शुद्ध सिल्वर की छड़ को ऐनोड बनाकर उसे लवण के विलयन में लटका दिया जाता है। विद्युत प्रवाहित करने पर आयन कैथोड पर जाकर अपचयित हो जाते हैं।

Ag(s)→Ag+ (aq)+e- (ऐनोड)

Ag+ (aq)+e- → Ag(s) (कैथोड)

प्रश्न 7- कोलराऊश नियम को परिभाषित कीजिए। इसके नियम का एक अनुप्रयोग उदाहरण सहित दीजिए। [ Important]

             अथवा 

कोलराऊश के नियम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: कोलराऊश का नियम- दुर्बल विद्युत अपघट्यों की मोलर चालकता (अनन्त तनुता पर) की गणना करने के लिए कोलराऊश ने एक नियम प्रतिपादित किया जिसे आयनों के स्वतन्त्र अभिगमन का कोलेराऊश नियम कहते है। इस नियम के अनुसार, “अनन्त तनुता पर, किसी विद्युत अपघट्य की मोलर चालकता उसके नियम सभी घनायनों एवं ऋणायनों की आयनिक मोलर चालकता का योग होती है।”

कोलराऊश नियम के अनुप्रयोग—

(1) दुर्बल वैद्युत अपघट्‌यों की अनन्त तनुता पर मोलर चालकता की गणना करने में।  आयनों की आयनिक गतिशीलता के मान की गणना करने में।  दुर्बल वैद्युत अपघट्‌यों के वियोजन की कोटि ज्ञात करने में- किसी दुर्बल विद्युत अपघट्य के वियोजन की कोटि (मात्रा), इसकी मोलर चालकता से निम्न प्रकार सम्बन्धित होती है l 

वियोजन की मात्रा (कोटि) =किसी सान्द्रता पर विद्युत अपघट्य के विलयन की मोलरचालकता/ अनन्त तनुता पर उसी विद्युत अपघट्य के विलयन की मोलर ए चालकता

अतः अनन्त तनुता तथा किसी सान्द्रता पर, विद्युत अपघट्य के विलयनकी मोलर चालकताएँ ज्ञात होने पर इसके वियोजन की कोटि की गणना उपर्युक्त सूत्र द्वारा की जा सकती है।

अल्प विलेय लवणों की विलेयता की गणना करने में।

प्रश्न:8- द्वितीयक सेल क्या है? सीसा संचायक सेल को समझाइए। 

                अथवा

 द्वितीयक सेल क्या है? इसे संचायक सेल क्यों कहा जाता है? 

उत्तर : व्यापारिक सेल-विद्युत-रासायनिक सेल विद्युत ऊर्जा का स्रोत है तथा ये व्यापारिक सेल के रूप में प्रयुक्त किए जा सकते हैं। जब एक से अधिक सेल श्रेणीक्रम में व्यवस्थित होती हैं, तो यह व्यवस्था बैटरी कहलाती है। सामान्यतः सेलों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है-

(i) प्राथमिक सेल, (ii) द्वितीयक सेल, (iii) ईंधन सेल।

सीसा संचायक सेल एक प्रकार की द्वितीयक सेल हैं तथा व्यापारिक सेल का उदाहरण है।

वे उत्क्रमणीय गैल्वेनिक सेल जिनमें उच्च ऊर्जायुक्त पदार्थ शीघ्र अभिक्रिया करके विद्युत धारा उत्पन्न करते हैं और अक्रिय हो जाते हैं। इन पदार्थों को बाह्य स्त्रोतों के द्वारा पुनः सक्रिय बना लिया जाता है और सेल को पुनः आवेशित किया जा सकता है। इनको द्वितीयक सेल कहते हैं। इन द्वितीयक सेलों को संचायक सेल भी कहते हैं। इनमें सीसा संचायक सेल प्रमुख है, जिसका वर्णन निम्न प्रकार से है-

इसमें ऐनोड Pb का बना होता है। Pb-Sb मिश्रधातु की जाली में महीन चूर्ण किया हुआ स्पंजी लेड भरा रहता है। कैथोड के रूप में Pb-Sb की जाली में – किसी PbO2 का महीन चूर्ण भरा होता है। इन कैथोड और ऐनोड की अनेक प्लेटों को एकान्तर क्रम में व्यवस्थित किया होता है तथा इनके मध्य सरन्ध्रमय प्लास्टिक या फाइबर ग्लास की शीट लगी होती है। ये सभी प्लेटें (तनु H2SO{4} 38% और घनत्व 1.30 ग्राम/सेमी) अम्ल में डूबी रहती है, जो सख्त रबड़ या प्लास्टिक पात्र से भरा होता है। यहाँ H{2}SO{4} विद्युत अपघट्य का कार्य करता है। बैटरी के निरावेशित होते समय अर्थात् विद्युत धारा देते समय निम्न अभिक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं-

मोलर

ऐनोड पर : Pb(s) + SO2 (aq) → PbSO4(s) + 2e

कैथोड पर : PbO2(s) + SO2 (aq) + 4H+(aq)+2e→PbSO4(s) + 2H2O(l)

सम्पूर्ण सेल अभिक्रिया-

Pb(s)+PbO2(8)+2H2SO4(aq)→2PbSO4(8)

                                  +2H_{2}O(l)

प्रश्न:9-मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड का सचित्र वर्णन कीजिए तथा इसकी एक उपयोगिता लिखिए।

[2026. Expected]

उत्तर : मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड- इस मानक इलेक्ट्रोड में प्लैटिनम का इलेक्ट्रोड होता है, जिसके ऊपर प्लैटिनम ब्लैक की परत चढ़ी होती है। इसके निर्माण हेतु प्लैटिनम धातु की एक पतली प्लेट को लेकर क्लोरोप्लैटिनिक अम्ल में रखते हैं और फिर उसमें विद्युत धारा ( A ,C.) प्रवाहित की जाती है, जिसके फलस्वरूप उसके ऊपर प्लैटिनम ब्लैक की परत चढ़ जाती है। यह प्लेट चित्र केअनुसार, एक काँच की नली से घिरी रहती है, जिसमें एक वायुमण्डल दाब पर हाइड्रोजन गैस प्रवाहित करने हेतु ऊपर से एक मार्ग होता है तथा काँच की नली के नीचे अवशेष हाइड्रोजन गैस निकालने हेतु एक अन्य मार्ग भी होता है। इस इलेक्ट्रोड को एक मोलर सान्द्रण वाले हाइड्रोजन आयन विलयन (1.0M HCI) में डुबा दिया जाता है। इस विलयन में एक वायुमण्डल दाब पर शुद्ध हाइड्रोजन गैस की कुछ मात्रा प्लैटिनम की सतह पर अधिशोषित हो जाती है तथा शेष अम्ल के मोलर विलयन में विलीन हो जाती है। इस कारण प्लैटिनम इलेक्ट्रोड पर अधिशोषित हाइड्रोजन गैस तथा विलयन में विद्यमान, हाइड्रोजन आयनों के मध्य साम्य स्थापित हो जाता है।

H2 → 2H(aq) +2e –

इसको निम्नलिखित प्रकार से भी व्यक्त कर सकते हैं-

H2(g) Pt / H(aq) या Pt / H2(g) / H (aq) 

P = 1 वायुमण्डल (a = 1M) P = 1वायुमण्डल(a=1M)

इस इलेक्ट्रोड का इलेक्ट्रोड विभव स्वेच्छा से शून्य (0.0000 वोल्ट) निर्धारित कर दिया जाता है।

उपयोग- इसकी सहायता से किसी इलेक्ट्रोड का मानक इलेक्ट्रोड विभव ज्ञात करने हेतु उसे इस इलेक्ट्रोड के साथ जोड़कर एक वैद्युत-रासायनिक (गैल्वेनिक) सेल का निर्माण किया जाता है और उसके पश्चात् उसका वैद्युत वाहक बल ज्ञात कर लेते हैं, जो उस इलेक्ट्रोड का हाइड्रोजन के सापेक्ष मानक इलेक्ट्रोड विभव होता है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु:- U.P बोर्ड परीक्षा में सफल होने के लिए अपने syllabus को अच्छी तरह से समझें और नियमित रूप से अभ्यास करते रहे साथ ही हर विषय पर ध्यान दे 

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