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Class 12 Biology Chapter 7 Important Questions Answers | Evolution महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

Class 12 Biology Chapter 7 Important Questions

Class 12 Biology Chapter 7 Important Questions Answers 

प्रश्न 1. पेनिसिलिन की खोज किसने की थी?

उत्तर : एलेक्जेण्डर फ्लेमिंग (Alexander Fleming, 1929) ने पेनिसिलिन प्रतिजैविक की खोज की थी। इसका उपयोग ग्राम पॉजीटिव जीवाणुओं द्वारा होने वाले रोगों के उपचार में किया जाता है।

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प्रश्न 2. किस पैथोजन के कारण हाथीपाँव (एलिफेंटिएसिस) रोग होता है? यह पैथोजन किस संघ से सम्बन्धित है?

उत्तर : फाइलेरिया या हाथीपाँव रोग (Filaria or elephantiasis Diseases) रोग वूचेरेरिया बैंक्रोफ्टाई कृमि द्वारा होता है। यह संघ एस्केहेल्मित्थीज का जन्तु है। इसका वाहक क्यूलेक्स अथवा एडीज मच्छर है।

प्रश्न 3. टाइफाइड बुखार किस जीव से उत्पन्न होता है।

उत्तर: सालमोनेला टाइफी नामक जीवाणु से।

प्रश्न 4. ऐल्कोहॉल दुरुपयोग के क्या कुप्रभाव हैं।

उत्तर: ऐल्कोहॉल/ड्रग के हानिकारक प्रभाव

ऐल्कोहॉल ड्रग्स के प्रयोग से व्यक्ति पर शारीरिक, मानसिक, व्यवहारगत प्रभाव पड़ते हैं। ड्रग्स के सामाजिक व आर्थिक प्रभाव भी है, जो समुदाय व राष्ट्र को भी प्रभावित करते हैं।

(1) ऐल्कोहॉल/ड्ग के तात्कालिक प्रतिकूल प्रभाव असन्तुलित व्यवहार, बर्बरता और हिंसा के रूप में व्यक्त होते हैं।

(2) इनकी अत्यधिक मात्रा के सेवन से श्वसन घात, हृदय घात अथवा प्रमस्तिष्क रुधिरस्त्राव के कारण मृत्यु हो सकती है।

(3) ऐल्कोहॉल/ड्ग के प्रयोग से व्यक्ति का सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। व्यक्ति एकाकीपन, अवसाद, थकावट, आक्रमणशील और विद्रोही व्यवहार, परिवार और मित्रों से बिगड़ते सम्बन्ध, भूख और वजन में घट-बढ़ आदि से प्रभावित होता है। शरीर की प्रतिरोध क्षमता नष्ट हो जाती है।

(4) ऐल्कोहॉल के प्रयोग से पेशीय सन्तुलन बिगड़ जाता है। मस्तिष्क एवं तन्त्रिका तन्त्र की प्रतिक्रिया विलम्ब से होने के कारण कार्य क्षमता एवं निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।

(5) जो व्यक्ति इन्जेक्शन द्वारा ड्रग लेते हैं, उनमें एड्स और यकृतशोथ-बी जैसे गम्भीर संक्रमण रोगों की सम्भावना अधिक होती है।

(6) ऐल्कोहॉल के प्रभाव से लिवर सिरोसिस तथा आमाशय एवं आँतों में पेप्टिक अल्सर (peptic ulcer) हो जाता है।

                  रोकथाम एवं उपचार

(1) आवश्यक समकक्षी दबाव से बचना चाहिए।

(2) शिक्षा और परामर्श। द्वारा उचित मार्गदर्शन करना।

(3) बचपन से ही उचित संस्कार, मार्गदर्शन, स्नेह व नैतिक शिक्षा देकर किशोरों में ड्रग्स को ‘न कहने’ का गुण विकसित किया जा सकता है। किशोरों को रचनात्मक कार्यों में लगाकर भी उन्हें ड्रग्स से बचाए रखा जा सकता है।

(4) चिकित्सीय सहायता से भी ऐल्कोहॉल के सेवन से छुटकारा पाया जा सकता है।

प्रश्न 5. एण्टअमीबा द्वारा कौन-सी बीमारी उत्पन्न होती है? इसका नियन्त्रण कैसे हो सकता है?

[Important questions]

उत्तर : पेचिश (अमीबिएसिस-Amoebiasis) या अमीबी अतिसार (Amoebic dysentery) – मनुष्यों में आमातिसार रोग एक प्रोटोजोआ परजीवी-एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolytica) के कारण होता है।

संचरण विधि (Mode of Transmission) – यह जलजन्य रोग है, जो खाद्य पदार्थों व जल के मानव मल से संदूषित होने के कारण होता है। एण्टअमीबा की सिस्ट मल-मुँह मार्ग (faeco-oral route) से शरीर में प्रवेश करती है। घरेलू मक्खी रोग के संचरण में मदद करती है। घरो के आस-पास सफाई पर ध्यान देना चाहिए। जल-स्रोतों का परीक्षण करके उचित मात्रा मे पोटैशियम परमैगनेट डालना चाहिए। रोगी को अन्य सदस्यों से पृथक् रखना चाहिए। रोगी के मल का उचित निस्तारण अत्यन्त आवश्यक है।

लक्षण (Symptoms) – कुछ व्यक्तियों में एण्टअमीबा द्वारा उत्पन्न अमीबी पेचिश के कोई लक्षण उत्पन्न नहीं होते। एण्टअमीबा की सिस्ट इनके मल के साथ निकलती रहती है। एण्टअमीबा के कुछ अन्य विभेद (strains) आँतो की भित्ति में घाव (ulcer) पैदा कर देते हैं।

प्रमुख लक्षण हैं अतिसार (diarrhoea), पेटदर्द, मरोड़ (cramps), बुखार, मल में श्लेष्म (mucous) के साथ रक्त की उपस्थिति (आँव)। रोग की गम्भीर अवस्था में यकृत (liver) भी प्रभावित होता है।

नियन्त्रण (Control) – व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सम्बन्धी विभिन्न प्रवृत्तियों को अपनाकर इस परजीवी के संक्रमण को रोका जा सकता है। खाने की वस्तुओं को भली-भाँति धोकर प्रयोग किया जाना चाहिए इसके अलावा पीने का पानी भी उबालकर प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इस परजीवी का संक्रमण दूषित जल तथा भोज्य पदार्थों से फैलता है। इस रोग पर नियन्त्रण हेतु सामुदायिक स्वच्छता (community or public sanitation) अति महत्त्वपूर्ण है।

उपचार (Treatment) – उपचार लक्षणों के आधार पर एण्टीप्रोटोजोअल ड्रग से किया जाता है।

प्रश्न 6. टायफॉइड के रोगजनक कौन हैं? उनके लक्षण लिखिए।

उत्तर : संक्रामक रोगों के कारक जीव रोगजनक (pathogens) कहलाते है, रोगजनक अनेक प्रकार के होते हैं; जैसे- वाइरस, बैक्टीरिया, फंजाई, प्रोटोजोआ, कृमि आदि। रोगजनकों द्वारा उत्पन्न रोग संचरणीय (communicable) होते हैं।

(i) . टायफॉइड (Typhoid)- यह रोग साल्मोनेला टाइफी (Salmonella

typhae) नामक जीवाणु द्वारा होता है। यह रोग प्रायः बच्चों में होता है। यह रोग संक्रमित खाद्य पदार्थों, रोगी के बर्तनों, कपड़ों को छूने से तथा रोगी के श्वास द्वारा फैलता है। मक्खियाँ भी रोग को फैलाने में सहायक होती है।

लक्षण (Symptoms) (1) प्रारम्भ में रोगी को सिरदर्द तथा ज्वर होता है।

(2) ज्वर के साथ शरीर में कमजोरी आ जाती है।

(3) अधिक प्रकोप होने पर रोगी की आँत क्षतिग्रस्त हो जाती है। त्वचा मे गुलाबी चकत्ते पड़ जाते हैं।

रोकथाम (Prevention) (1) व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

(2) रोगी के मल का उपयुक्त विधि से निष्पादन होना चाहिए।

(3) टायफॉइड निरोधक टीका लगवाना चाहिए।

(4) रोग के जीवाणु की पहचान विडाल परीक्षण (Widal test) द्वारा की जाती है।

(ii) . जुकाम (Common Cold) या इन्फ्लुएन्जा (Influenza) – यह रोग ऑथोंमिक्सो विषाणु या मिक्सोवाइरस इन्फ्लुएन्जाई के कारण होता है। विषाणु का संक्रमण नाक से स्रावित तरल से वायु द्वारा होता है।

 रोग के लक्षण (Symptoms of Disease) – सिरदर्द, थकावट मांसपेशियों में पीड़ा, साधारण ज्वर, खाँसी, बलगम तथा छींक आना आदि रोग के लक्षण होते हैं।

प्रश्न 7. स्टेम कोशिकाओं पर टिप्पणी कीजिए। [ 2026 expected]

उत्तर: स्टेम कोशिकाएँ एवं चिकित्सकीय उपचार

स्टेम कोशिकाएँ ऐसी अविभेदित कोशिकाएँ होती हैं, जो किसी भी प्रकार की कोशिकाओं में बदल सकती है। इन कोशिकाओ को शरीर के किसी अंग या किसी भी कोशिका की मरम्मत के लिए प्रयोग किया जा सकता है। स्टेम कोशिकाओं मे विकसित कोशिका के रूप में विशिष्टता अर्जित करने की क्षमता होती है। इसे कोशिका चिकित्सा कहते हैं। क्लोनन (cloning) के साथ जैव प्रौद्योगिकी ने कोशिका चिकित्सा को नया आयाम प्रदान किया है। कोशिका चिकित्सा के अन्तर्गत ऐसी कोशिकाओं का अध्ययन किया जाता है, जिनमे विभाजन, वृद्धि और विभेदन द्वारा नए ऊतक बनाने की क्षमता है।

सर्वप्रथम रक्त बनाने वाले ऊतकों से इस चिकित्सा का प्रारम्भ हुआ था। अस्थि मज्जा से प्राप्त ये कोशिकाएँ जीवनपर्यन्त रक्त का उत्पादन करती हैं। कैन्सर आदि रोगों में इनका प्रत्यारोपण कर पूरी रक्त प्रणाली को पुनसृर्जित किया जा सकता है। अस्थि मज्जा (bone marrow) और गर्भनाल रुधिर स्टेम कोशिकाओं का उपयोग कैंसर रोग से पीड़ित रोगियों की ल्यूकीमिया एवं लिम्फोमा में चिकित्सा हेतु किया जाता रहा है। कीमोथैरेपी के दौरान कैन्सर कोशिकाओ को सायटोटॉक्सिन (cytotoxins) का प्रयोग करके नष्ट किया जाता है। ये अभिकारक ल्यूकीमिया कोशिकाओं और अस्थि मज्जा में स्थित हीमेटोपोटिक स्टेम कोशिकाओं में विभेद नहीं कर पाते। इस कारण परम्परागत कीमोथैरेपी चिकित्सा की पद्धति से उत्पन्न इन दुष्प्रभावों को दूर करने का प्रयास स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 8. डेंगू ज्वर, निमोनिया के बारे मे लिखिए और न्यूमोनिया के रोगजनक कौन है? उनके लक्षण लिखिए।

उत्तर: 1. डेंगू ज्वर (Dengue fever) – यह रोग डेंगू विषाणु (आर०एन०ए० विषाणु) से होता है तथा मादा एडीज इजिप्टियाई (Aedes aegypti) मच्छर के काटने से फैलता है। मच्छर जब संक्रमित व्यक्ति का रक्तपान करता है, तो वह 9 से 12 दिनों में स्वयं संक्रमित हो जाता है। यह संक्रमित मच्छर जब किसी व्यक्ति का रक्तपान करता है, तो रक्तपान करते समय लार के माध्यम से विषाणु को व्यक्ति में पहुँचा देता है।

इस रोग में तीव्र ज्वर के साथ-साथ शरीर में अत्यधिक पीड़ा होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ज्वर के कारण अस्थियाँ टूट रही हो, इस कारण इसे हड्डी-तोड़ ज्वर भी कहते हैं। विषाणु संक्रमण के कारण डेंगू रक्त स्त्राव ज्वर (dengue haemorrhagic fever) भी हो सकता है। इसके फलस्वरूप रक्त परिसंचरण अवरुद्ध होने से शरीर पर विशेषकर चेहरे पर चकत्ते बन जाते हैं। रोकथाम हेतु मच्छरों से बचाव के विभिन्न उपाय किए जाने चाहिए।

2. न्यूमोनिया (Pneumonia) मानव में न्यूमोनिया रोग के लिए स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी (Streptococcus pneumoniae) और हीमोफिलस इन्फ्लुएन्जी (Haemophilus influenzae) जैसे जीवाणु उत्तरदायी हैं। इस रोग में फुफ्फुस अथवा फेफड़ों (lungs) के वायुकोष्ठ संक्रमित हो जाते हैं। इस रोग के संक्रमण से वायुकोष्ठों में तरल भर जाता है जिसके कारण साँस लेने में परेशानी होती है। इस रोग के लक्षण ज्वर, ठिठुरन, खाँसी और सिरदर्द आदि हैं। न्यूमोनिया विषाणुजनित भी होता है।

न्यूमोनिया की रोकथाम

न्यूमोनिया एक वायु जनित (air borne) रोग है। संक्रमण ड्रॉपलेट विधि व फोमाइट द्वारा भी फैल सकता है, अतः इसे निम्न प्रकार रोका जा सकता है-

व्यक्तिगत व सामुदायिक स्वच्छता बढ़ाकर।

मास्क के प्रयोग व पर्याप्त शारीरिक दूरी बनाए रखकर।

भीड़-भाड़ वाले स्थानों से बचकर।

खाँसते-छींकते समय चेहरे को रुमाल से ढककर।

पोषक आहार, प्राणायाम-योग अपनाकर।

प्रश्न 9. फाइलेरियता (फाइलेरिएसिस) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: मनुष्य में मलेरिया, फाइलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगू, मस्तिष्क ज्वर (एन्सिफेलाइटिस) आदि रोगों के वाहक मच्छरों की विभिन्न प्रजातियाँ हैं। इनमें रोगजनक भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। मलेरिया में यह प्रोटोजोआ है, फाइलेरिया में गोलकृमि तथा डेंगू, चिकनगुनिया व मस्तिष्क ज्वर में वाइरस।

मादा ऐनाफिलीज गैम्बी (female Anopheles gambiae) मच्छर मलेरिया रोग के रोगाणुओं का वाहक कीट है। एडीज या क्यूलेक्स पिपिएन्स (Aedes or Culex pipiens) मच्छर फीलपाँव (filariasis) रोग के रोगाणुओ का वाहक कीट होता है।

1. मलेरिया (Malaria)- यह रोग प्लाज्मोडियम के कारण होता है। कँपकँपी के साथ तेज बुखार, ठिठुरन, जी मिचलाना, सिर व पैरों में दर्द इसके लक्षण हैं। इसके उपचार में कुनैन नामक औषधि दी जाती है।

2. फीलपाँव (फाइलेरिएसिस-Filariasis) – यह रोग वूचेरेरिया

बैक्रोफ्टाई (Wuchereria bancrofti) निमेटोड द्वारा होता है। यह कृमि लसीका वाहिनियों में रहता है। वयस्क कृमि सजीव और मृत दोनों ही स्थिति में रोग उत्पन्न करते हैं। जीवित अवस्था में खुजली पैदा करता है और हानिकारक उपापचय पदार्थों का संचय करता है, इसके फलस्वरूप लसीका वाहिनियों की एण्डोथीलियल उपकला कोशिकाएँ विभाजित होकर वाहिनियों की गुहा को बन्द कर देती है। इसके फलस्वरूप बुखार आता है और यकृत, प्लीहा, अण्डकोष (scrotum), पैर आदि सूज जाते हैं। इस रोग को फीलपाँव कहते हैं। यह रोग एडीज या क्यूलेक्स मच्छर के काटने से फैलता है।

रोग से बचाव के लिए मच्छरों को नष्ट करना चाहिए। उनके काटने से बचना चाहिए।

प्रश्न 10. ऐस्कैरिसता क्या है? इससे बचाव व उपचार के बारे मे लिखिए।

उत्तर : ऐस्कैरिएसिस (Ascariasis) अन्तः परजीवी गोलकृमि एस्कैरिस (Ascaris) का ग्रसन (infestation) ऐस्कैरिएसिस कहलाता है।

रोगजनक – एस्कैरिस लम्बीकॉइडिस

एस्कैरिस 15-35 सेमी लम्बाई का, सफेद रंग का कृमि है जो पोषक मनुष्य की आँत में रहता है।

रोग का संचरण मलमुखीय मार्ग (faeco-oral route) अपनाता है, क्योकि ऐस्कैरिस के अण्डे रोगी के मल में उपस्थित होते हैं।

रोग के प्रमुख लक्षण हैं- पेटदर्द, आन्तरिक रक्तस्त्राव, ज्वर व आँतों का अवरुद्ध होना, कुपोषित स्थिति, रक्ताल्पता व अनियमित शौच। रोग की पहचान व्यक्ति के मल में अण्डों की उपस्थिति के आधार पर की जाती है।

बचाव व उपचार- व्यक्तिगत व सामुदायिक स्वच्छता अपनाकर इस रोग से बचा जा सकता है। मिट्टी में खेलने के बाद हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोकर, नाखून छोटे रखकर, फल-तरकारी अच्छी तरह धोकर खाने से अर्थात् खानपान में स्वच्छता अपनाकर इस रोग से बचा जा सकता है। कृमिनाशक औषधियों जैसे एल्बेन्डाजोल (albendazole) व डिकेरिस (decaris) से रोग का नियन्त्रण किया जा सकता है।

 

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1- यूपी बोर्ड परीक्षा में सफलता के लिए सिलेबस को अच्छी तरह समझे और नियमित अभ्यास करें ।

2- पढ़ाई कि योजना बनाए जिसमे हर विषय के लिए  समय हो समझो टॉपिक पर ज्यादा फॉक्स करे।

3- पेपर में पहले आसान सवाल हल करें सभी प्रश्नों के उत्तर दें बिन कोई छोड़ें।

4- परीक्षा में व्हाइटनर(whitener) का उपयोग न करें केवल काला(black), नीला (blue) पेन का उपयोग करें ।

 

 


 

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