Class 12 Physics Chapter 4 Important Questions Answers
महत्त्वपूर्ण परिभाषाए –
▶चुम्बकीय क्षेत्र – किसी चुम्बक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें किसी चुम्बकीय सुई पर एक बल-आघूर्ण कार्य करता है जिसके कारण चुम्बकीय सुई घूमकर एक निश्चित दिशा में ठहरती है, चुम्बक का चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है।
▶ ऐम्पियर का परिपथीय नियम- किसी बन्द परिपथ की सीमा के अनुदिश चुम्बकीय क्षेत्र B→ का रेखीय समाकल पथ द्वारा घिरी नेट धारा i का
u⁰ गुना होता है।
▶ धारामापी – वह उपकरण जो किसी वैद्युत परिपथ में धारा की उपस्थिति ज्ञात करने तथा धारा के मापन के लिए प्रयुक्त किया जाता है, धारामापी कहलाता है।
चल कुण्डली धारामापी दो प्रकार के होते हैं- (i) निलम्बित कुण्डली धारामापी तथा (ii) कीलकित कुण्डली धारामापी।
▶धारामापी को अमीटर में बदलने के लिए धारामापी की कुण्डली के समान्तर-क्रम में लघु प्रतिरोध लगा देते हैं।
▶ धारामापी को वोल्टमीटर में बदलने के लिए धारामापी की कुण्डली के श्रेणीक्रम में उच्च प्रतिरोध लगा देते हैं।
— परीक्षा के दृष्टिकोण से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न —-
प्रश्न 1. ऐम्पियर की परिभाषा अपने दीजिए।
उत्तर : ऐम्पियर की परिभाषा – “1 ऐम्पियर वह वैद्युत धारा है जो कि निर्वात अथवा वायु में परस्पर 1 मीटर की दूरी पर स्थित दो सीधे, लम्बे व समान्तर चालक तारों में प्रवाहित होने पर, प्रत्येक तार की प्रति मीटर लम्बाई पर 2 × 10 ^ – 7 न्यूटन का बल उत्पन्न करती है।”
प्रश्न 2- चुम्बकीय आघूर्ण की परिभाषा दीजिए।
उत्तर : एकांक चुम्बकीय क्षेत्र में लम्बवत् रखे चुम्बकीय द्विध्रुव पर लगने वाले बलयुग्म के आघूर्ण को चुम्बकीय आघूर्ण कहते हैं।
प्रश्न 3-किसी धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के सम्बन्ध में बायो-सेवर्ट के नियम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : बायो-सेवर्ट का नियम- इसके अनुसार, “किसी धारावाही चालक के एक अल्पांश द्वारा किसी बिन्दु पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र (∆B) धारा के, अल्पांश की लम्बाई ∆l के तथा अल्पांश व अल्पांश को उस बिन्दु से मिलाने वाली रेखा के बीच के कोण की sine के अनुक्रमानुपाती होता है तथा उस बिन्दु की अल्पांश से दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
∆B= u⁰/4π i∆lsin/r² न्यूटन (ऐम्पियर-मीटर)
प्रश्न 4- चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण से क्या तात्पर्य है? इसका मात्रक लिखिए। यह कैसी राशि हैl
उत्तर : चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण- किसी चुम्बकीय द्विध्रुव का चुम्बकीय आघूर्ण, उस बल-युग्म के आघूर्ण के बराबर है जो कि चुम्बकीय द्विध्रुव को एकांक एवं एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में, क्षेत्र की दिशा में लम्बवत् रखने पर चुम्बकीय द्विध्रुव पर लगता है।
यह सदिश राशि है तथा इसकी दिशा द्विध्रुव की अक्ष के अनुदिश, दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है।
इसका मात्रक ऐम्पियर-मीटर है।
प्रश्न 5- चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर : चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त- जब किसी धारावाही कुण्डली को एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक बल-युग्म कार्य करता है, जिसका आघूर्ण कुण्डली में प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है। इसी सिद्धान्त पर चल कुण्डली धारामापी कार्य करता है।
प्रश्न 6- चुम्बकीय फ्लक्स की परिभाषा दीजिए तथा इसका मात्रक लिखिए।
उत्तर : चुम्बकीय फ्लक्स- किसी चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित किसी पृष्ठ से लम्बवत् गुजरने वाली चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स कहते हैं।
इसका मात्रक वेबर (Weber) है।
प्रश्न 7- लॉरेन्ज बल क्या है?
उत्तर : लॉरेन्ज बल- जब कोई आवेशित कण किसी चुम्बकीय क्षेत्र में गति करता है, तो उस पर एक बल कार्य करता है, जिसे लॉरेन्ज बल कहते हैं। इस बल की दिशा फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से ज्ञात की जाती है।
प्रश्न 8- चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के दो गुण लिखिए।
उत्तर : चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण-
1. ये रेखाएँ उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं और चुम्बक के अंदर दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर जाती हैं, इस प्रकार ये बन्द वक्र बनाती हैं।
2. दो चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटतीं। यदि वे काटतीं, तो कटान बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दो दिशाएँ होतीं, जो असम्भव है।
प्रश्न 9- धारामापी को अमीटर में कैसे परिवर्तित किया जाता है?
उत्तर : धारामापी को अमीटर में बदलने के लिए धारामापी की कुण्डली के समान्तर-क्रम में एक बहुत कम प्रतिरोध का तार (शंट) लगा देते हैं। यह शंट धारामापी को उच्च धाराओं से बचाता है और अमीटर के परास को बढ़ाता है।
प्रश्न 10- धारामापी को वोल्टमीटर में कैसे परिवर्तित किया जाता है?
उत्तर : धारामापी को वोल्टमीटर में बदलने के लिए धारामापी की कुण्डली के श्रेणीक्रम में एक बहुत उच्च प्रतिरोध लगा देते हैं। यह उच्च प्रतिरोध धारामापी से प्रवाहित होने वाली धारा को सीमित करता है और वोल्टमीटर को उच्च विभवान्तर मापने में सक्षम बनाता है।
प्रश्न 11-सिद्ध कीजिए कि चल कुण्डल धारामापी में प्रवाहित धारा उसमें उत्पन्न विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है।
( Most important)
उत्तर: चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त- जब धारामापी के सम्बन्धक पेंचों T₁ व T₂ को किसी धारावाही परिपथ में जोड़ते हैं तो कुण्डली में वैद्युत धारा बहने लगती है। चूँकि कुण्डली चुम्बकीय क्षेत्र में लटकी है, अतः इस पर एक विक्षेपक बल-युग्म कार्य करने लगता है। माना किसी क्षण कुण्डली के तल पर अभिलम्ब चुम्बकीय बल क्षेत्र की दिशा से कोण बनाता है। यदि कुण्डली में फेरों की संख्या N हो, कुण्डली का क्षेत्रफल A हो तो विक्षेपक बलयुग्म का आघूर्ण t = NBiA sinó
जहाँ i, कुण्डली में वैद्युत धारा है। कुण्डली के घूमने से उसको लटकाने वाली पत्ती तथा नीचे के स्प्रिंग में ऐंठन आने लगती है जिसके कारण कुण्डली पर एक ऐंठन बल-युग्म कार्य करने लगता है जो कुण्डली के घूमने का विरोध करता है। जब ऐंठन बल-युग्म, विक्षेपक बल-युग्म के बराबर हो जाता है तो कुण्डली सन्तुलन की स्थिति में ठहर जाती है।
माना कि सन्तुलन की स्थिति में ऐंठन का कोण ø रेडियन है। यदि ऐंठन बल-युग्म c हो तो ø रेडियन के लिए ऐंठन बल-युग्म का आघूर्ण cø होगा। कुण्डली की सन्तुलन अवस्था मे विक्षेपक बल-युग्म का आघूर्ण ऐंठन बल-युग्म का आघूर्ण NBiA = Cø
जहाँ K= c/(NBA)
एक नियतांक है जिसे धारामापी का ‘धारा परिवर्तन-गुणांक’ कहते हैं।
अर्थात् कुण्डली में प्रवाहित धारा, उत्पन्न विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है।
कार्यविधि-सबसे पहले क्षैतिजकारी पेंचों के द्वारा धारामापी के आधार को क्षैतिज कर लेते हैं जिससे कि कुण्डली चुम्बकीय क्षेत्र में स्वतन्त्रतापूर्वक घूम सकें। एक लैम्प से आने वाली प्रकाश की किरणों को कुण्डली से लटकाने वाली पत्ती पर लगे दर्पण से परावर्तित करके एक पैमाने के शून्यांक पर केन्द्रित कर ‘लेते हैं। अब नापी जाने वाली वैद्युत धारा को सम्बन्धक पेंचों T1 व T2 के द्वारा कुण्डली में प्रवाहित कर देते हैं। इससे कुण्डली दर्पण सहित घूमती है तथा पैमाने पर प्रकाश-बिन्दु की स्थिति बदल जाती है।
माना, पैमाने से दर्पण की दूरी D है तथा कुण्डली में विक्षेप होने पर पैमाने पर प्रकाश-बिन्दु का विस्थापन d होता है।
tan 2ø= d/D
tan2ø = 2ø
यदि छोटा है, 2ø= d/D, ø= d/(2D)
दूरी D स्थिर (लगभग 1 मीटर) रखी जाती है, अतः उत्पन्न विक्षेप विस्थापन d के अनुक्रमानुपाती होता है।
अतः
धारामापी की धारा सुग्राहिता is = NAB/C
इस प्रकार धारामापी की धारा सुग्राहिता n. A तथा B का मान बढ़ाकर तथा C का मान कम करके बढ़ाई जा सकती है।
