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Most Important Questions Answers for Class 12 Biology (हिंदी माध्यम) – अध्याय 6 विकाश | MK Sir Guide

Class 12 Biology Chapter 6 विकाश Important Questions Answers 

प्रश्न 1. प्राकृतिक चयनवाद का मत किसने प्रस्तुत किया? उसकी पुस्तक का नाम प्रकाशन वर्ष के साथ बताइए।

उत्तर : प्राकृतिक चयनवाद का मत चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) ने प्रस्तुत किया। उन्होंने 24.11.1859 को “ऑन दि ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाई मीन्स ऑफ नेचुरल सेलेक्शन” बहुचर्चित पुस्तक प्रकाशित की।

प्रश्न 2.अनुहरण क्या है? किसी एक कीट के अनुहरण का उदाहरण लिखिए।

उत्तर : जीवों में पर्यावरण के अनुरूप पायी जाने वाली समानताएँ, जिससे वे शत्रु से स्वयं की रक्षा कर सकें, अनुहरण (mimicry) कहलाती है। इसमें जीव किसी अन्य प्राणी, पौधे या किसी अजैव वस्तु जैसे दिखाई देते हैं जैसे पर्णाभकीट पत्ती सदृश हरे रंग का होता है। स्टिक कीट सूखी टहनी जैसा दिखता है।

प्रश्न 3. जैव विकास किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: प्रारम्भिक निम्न कोटि के सरल जीवो से समय के साथ क्रमिक परिवर्तनों द्वारा विकसित एवं जटिल जीवो की उत्पत्ति को उद्विकास (उद्विकास) कहते हैं। प्रकृति की वातावरणीय दशाएँ बदलती रहती है। जीवधारियो में वातावरण के अनुरूप परिवर्तन होते रहते हैं। यह निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। इसके फलस्वरूप आदिकालीन सरलतम जीवधारियों से आधुनिक जटिल जीवों का उ‌द्विकास होता है।

प्रश्न 4. प्रथम आदि मानव का वैज्ञानिक नाम लिखिए।

उत्तर : ऑस्ट्रेलोपिथिकस एफ्रीकेन्स (Australopithecus africans)

प्रश्न 5. . जेनेटिक ड्रिफ्ट को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा आकस्मिक रूप से ऐलील आवृत्ति (gene frequency) में संयोगवश काफी कमी आ जाती है, आनुवंशिक विचलन कहलाती है। इसके कारण नई पीढ़ियों के जीन नमूने अपनी ही जाति के मूल नमूनों से भिन्न हो जाते हैं।

प्रश्न 6. आधुनिक मानव का जैव वैज्ञानिक नाम बताइए।

उत्तर : होमो सैपियन्स सैपियन्स (Homo sapiens sapiens)

प्रश्न 7. डार्विन के योगदान पर टिप्पणी कीजिए

उत्तर : चार्ल्स डार्विन ने जैव विकास का प्राकृतिक वरण सिद्धान्त प्रस्तुत किया। ये पहले विशिष्ट सृष्टिवाद में विश्वास रखते थे। किन्तु प्रकृति का अध्ययन करने के पश्चात् जैव विकास परिकल्पना के समर्थक बने। इन्होंने प्राकृतिक वरण द्वारा जीव जातियों के विकास की परिकल्पना प्रस्तुत की।

प्रश्न 8. पूर्वजता या प्रत्यावर्तन से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: जीवधारियों में कभी-कभी अवशेषी अंग पूर्ण विकसित अवस्था मे प्रदर्शित हो जाते हैं, इसे पूर्वजता या प्रत्यावर्तन (atavism or reversion) कहते हैं। पूर्वजता जीवधारियो के पूर्व पूर्वजों के लक्षणों को प्रदर्शित करती है; जैसे कभी-कभी नवजात शिशु में पूँछ का पाया जाना, शरीर पर घने बालों का पाया जाना आदि।

प्रश्न 9. अंगों में कम या अधिक प्रयोग का सिद्धांत क्या हैं इस सिद्धांत को किस वैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया।

उत्तर: अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिद्धान्त लैमार्कवाद या उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त कहलाता है। इसे जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क (1809) ने प्रतिपादित किया था।

उपार्जित लक्षणों (Acquired characters) की वंशागति- वातावरणीय प्रभाव तथा अंगों की उपयोगिता या अनुपयोगिता के कारण जो भिन्नताएँ उत्पन्न होती है, उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired characters) कहते हैं। लैमार्क के अनुसार उपार्जित लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत होते रहते हैं। इसके फलस्वरूप नई जातियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

लैमार्क ने अपने सिद्धान्त को मुख्यतः जिराफ के विकास द्वारा समझाया। लैमार्क के अनुसार, जिराफ के पूर्वजों की गर्दन छोटी थी। वातावरण में परिवर्तन के कारण वनस्पतियों की कमी हो गई और जिराफ के पूर्वजों को वृक्षों से भोजन प्राप्त करने के लिए गर्दन ऊपर करनी पड़ती थी। इसके फलस्वरूप गर्दन तथा अगली टाँगों पर निरन्तर खिचाव के कारण गर्दन व अगली टाँगे लम्बी हो गईं। यह उदाहरण अंगों के लगातार प्रयोग से उनके विकसित होने का है।

दूसरा उदाहरण लैमार्क ने सर्पों में टाँगों के विलुप्त होने का दिया। लैमार्क ने बताया कि सर्पों के पूर्वजों में टोंगे पायी जाती थी। साँप बिल में रहते है। बिल में घुसते समय तथा झाड़ियों से गुजरते समय टांगें रुकावट डालती थीं। सपों ने इनका उपयोग करना छोड़ दिया जिसके कारण पैर व मेखला (girdles) धीरे-धीरे छोटे होते चले गए और अन्ततः विलुप्त (disappear) हो गए। अंगों का विलुप्त होना अनुपयोग (disuse) का उदाहरण है। बोया प्रजाति के सर्पों में श्रोणि मेखला के अवशेषों की उपस्थिति इसे प्रमाणित करती है।

प्रश्न 10. आर्कियोप्टेरिक्स का विकास किस काल एवं युग में हुआ? इसके सरीसृप वर्ग तथा पक्षी वर्ग का एक-एक लक्षण लिखिए।

उत्तर : आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) का विकास मीसोजोइक महाकल्प के जुरैसिक काल (Jurassic period) के अन्तिम चरण में हुआ। सरीसृपों के समान इसकी चोच में दाँत थे, अंगुलियों पर नखर और लम्बी दुम थी। पक्षियों की भाँति इसके अग्रपाद पंख के रूप में रूपान्तरित थे तथा शरीर पर परों (feathers) का बाह्य कंकाल पाया जाता था। ये समतापी थे।

प्रश्न 11. मिलर के प्रयोग का चित्र के साथ टिप्पणी कीजिए।

[ Important question ]

उत्तर: रूसी वैज्ञानिक ए० आई० ओपेरिन (A.I. Oparin, 1924) ने रासायनिक उद्विकास द्वारा जीवन की उत्पत्ति नामक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। स्टैनले मिलर (Stanley Millar) ने अपने प्रयोग द्वारा ओपेरिन के कथन की पुष्टि की थी।

स्टैनले मिलर का प्रयोग मिलर ने 5 लीटर के फ्लास्क में मेथेन,

हाइड्रोजन तथा अमोनिया का मिश्रण 2:2:1 के अनुपात में लिया। आधा लीटर के एक फ्लास्क को नलिका द्वारा 5 लीटर वाले फ्लास्क से जोड़ दिया। छोटे फ्लास्क में निरन्तर पानी के उबलते रहने का प्रबन्ध किया, ताकि जलवाष्प नलिका द्वारा बड़े फ्लास्क में पहुँचती रहे। आदि वायुमण्डल की परिस्थितियों को उत्पन्न करने के लिए 5 लीटर वाले फ्लास्क में टंगस्टन के इलेक्ट्रोड के मध्य 60,000 वोल्ट की विद्युतधारा लगभग एक सप्ताह तक प्रवाहित की। उपकरण में गैसीय मिश्रण को संघनित करने के लिए कण्डेन्सर की व्यवस्था की।

गैसीय मिश्रण कण्डेन्सर द्वारा पुनः द्रव में बदलता रहा। CH4, NH3, H2 तथा H₂O का यह मिश्रण उपकरण में एक सप्ताह तक उबलता रहा। प्रयोग के अन्त में एक लाल रंग का गेंदला तरल प्राप्त हुआ। इस तरल पदार्थ का परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि यह विभिन्न ऐमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं तथा कार्बनिक अम्लों का मिश्रण था।

स्टैनले मिलर के प्रयोग से ओपेरिन के इस कथन की पुष्टि होती है कि आदि वातावरण में उपस्थित मेथेन (CH_{4}) अमोनिया (NH_{3}) हाइड्रोजन (H_{2}) तथा जलवाष्य से ही जीवन की उत्पत्ति हुई।

प्रश्न 12. वंशागत तथा उपार्जित लक्षणों में अन्तर बताइए तथा प्रत्येक का उदाहरण दीजिए।

उत्तर : वंशागत लक्षण या भिन्नताएँ– जोन ढाँचे में परिवर्तन के फलस्वरूप जीवों में उत्पन्न होने वाली विभिन्नताएँ या लक्षण वंशागत होते हैं। जीन डाँचो में भिन्नता लैंगिक जनन के समय युग्मकजनन या निषेचन के समय युग्मकों के अनियमित रूप से संलयन के फलस्वरूप अथवा उत्परिवर्तन के फलस्वरूप होती है, जैसे-वर्णान्धता, हीमोफीलिया, सिकिल सेल एनीमिया आदि व्याधियाँ।

उपार्जित लक्षण या भिन्नताएँ- ये वातावरणीय प्रभाव (भोजन, ताप, प्रकाश, नमी आदि), अंगों के उपयोग व अनुपयोग के फलस्वरूप अथवा अन्तःसावी हॉमोंन्स के अल्प या अतिसावण के फलस्वरूप उत्पन्न भिन्नताएँ (लक्षण) होती है। ये भिन्नताएँ या उपार्जित लक्षण बंशागत नहीं होते। पहलवान व लौहार की मांसपेशियों अधिक सुगठित एवं सुदृद्ध होती है। ये अभ्यास के कारण होता है।

प्रश्न 13. नव-डार्विनवाद पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर : नव-डार्विनवाद या नियो-डार्विनिज्म- आधुनिक वैज्ञानिकों ने आनुवंशिकी के आधार पर डार्विनवाद की त्रुटियों को दूर करके नव-डार्विनवाद प्रस्तुत किया है। इसमें श्मिट (Schmidt), डॉब्जेन्स्की (Dobzhansky) तथा स्टेबिन्स (Stebbins) आदि प्रकृति वैज्ञानिकों की मुख्य भूमिका है।

नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism) के अनुसार, नई जातियों का विकास अग्रलिखित कारकों से होता है-

1. विभिन्नताएँ (Variations) – लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न सन्तानों मे विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। ये विभिन्नताएँ मुख्यतया युग्मक निर्माण के समय होने वाले क्रॉसिंग ओवर के कारण होती हैं। लैंगिक जनन के समय माता-पिता के गुणसूत्रों का सम्मिश्रण होता रहने से भी विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।

उत्परिवर्तन के कारण भी विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। उत्परिवर्तन तीन प्रकार के होते हैं-

(i) जीन उत्परिवर्तन (Gene mutation) – गुणसूत्र पर जीन की स्थिति बदल जाती है अथवा जीन की रासायनिक संरचना में परिवर्तन होने से जीन के मूल लक्षण बदल जाते हैं।

(ii) गुणसूत्र उत्परिवर्तन (Chromosomal mutation)- युग्मक निर्माण के समय होने वाली त्रुटियों के कारण गुणसूत्र की संरचना बदल जाती है, इससे विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।

(iii) गुणसूत्र समूह उत्परिवर्तन (Genomatic mutation)- इसमें गुणसूत्रों की संख्या बदल जाने से विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।

2. प्राकृतिक चयन (Natural selection) – लाभदायक विभिन्नता वाले जीवधारी स्वयं को वातावरण से अनुकूलित किए रहते हैं, इसके फलस्वरूप लाभदायक विभिन्नताएँ वंशागत होती है अर्थात् इनका प्राकृतिक चयन होता रहता है। इसके फलस्वरूप प्रारम्भिक जातियाँ बनती है।

3. पृथक्करण (Isolation) – भौगोलिक तथा लैंगिक पृथक्करण के फलस्वरूप जीवधारियों में अन्तः प्रजनन नहीं हो पाता, इसके फलस्वरूप अलग-अलग वातावरण में रहने के कारण अनुकूलन के फलस्वरूप नई जातियों का विकास होता है।

प्रश्न 14. उत्परिवर्तन पर उदाहरण सहित टिप्पणी कीजिए। [ 2026 Expected]

उत्तर: उत्परिवर्तन

गुणसूत्रों का निर्माण न्यूक्लियोप्रोटीन्स से होता है। न्यूक्लियोप्रोटीन्स न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन्स से बने होते हैं। डी०एन०ए० अणुओं के रासायनिक संयोजन में होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (mutation) कहते हैं। उत्परिवर्तन के फलस्वरूप डी०एन०ए०, अणुओं में न्यूक्लियोटाइड्स क्षारक जोड़ियो के अनुक्रम बदल जाते हैं। डी०एन०ए० अणुओं की संरचना में भिन्नता के कारण विभिन्नताएँ (variations) उत्पन्न होती है। उत्परिवर्तन सिद्धान्त ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries, 1901) ने प्रतिपादित किया था।

जीन उत्परिवर्तन, गुणसूत्र उत्परिवर्तन, गुणसूत्र समूह उत्परिवर्तन के कारण विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।

जीवधारियों में उत्परिवर्तनों को वंशागति के आधार पर दो समूह में बाँट लेते हैं-

1. दैहिक उत्परिवर्तन (Somatic mutation) – बहुकोशिकीय जीवों में जैविक क्रियाएँ दैहिक कोशिकाओं द्वारा होती है। कभी-कभी हानिकारक पदार्थों, विकिरण अथवा विषाणु संक्रमण के फलस्वरूप दैहिक कोशिकाओं का डी०एन०ए० प्रभावित हो जाता है. इसे दैहिक उत्परिवर्तन कहते हैं। इसके फलस्वरूप दैहिक विभिन्नताएँ (somatic variations) उत्पन्न होती है। ये विभिन्नताएँ वंशागत नहीं होतीं। दैहिक उत्परिवर्तनों के कारण दृश्य रूप लक्षण बदल जाते हैं।

2. जननिक उत्परिवर्तन (Germinal mutation) – जनन कोशिकाएँ (germ cells) सन्तानोत्पत्ति से सम्बन्धित होती हैं। जनन कोशिकाओं में नर या मादा युग्मक बनते हैं। युग्मकों के संलयन से युग्मनज (zygote) बनता है। युग्मनज से भ्रूणीय विकास द्वारा संतति का विकास होता है। जननिक कोशिकाओ में होने वाले उत्परिवर्तनों को जननिक उत्परिवर्तन कहते हैं। इसके फलस्वरूप उत्पन्न विभिन्नताएँ वंशागत होती है।

उत्परिवर्तन शरीर की आन्तरिक दशाओं या बाह्य कारणों से होते हैं। इसके आधार पर उत्परिवर्तनो को दो समूहों में बाँट लेते हैं-

(i) स्वजात उत्परिवर्तन (Autogenous mutation) – ये जीवधारी के शरीर में होने वाली प्रक्रियाओं की अनियमितताओं के कारण होते हैं। ये त्रुटियाँ सामान्यतया लिंगी जनन के समय युग्मक निर्माण या निषेचन के समय होती हैं। हॉमॉन्स या हानिकारक पदार्थों के कारण भी स्वजात उत्परिवर्तन हो जाते हैं।

उदाहरण-सिकिल सेल एनीमिया, ईवनिग प्रिमरोज।

(ii) प्रेरित उत्परिवर्तन (Induced mutation)- ये बाह्य कारकों के कारण होते हैं। इन्हे बहिर्जात उत्परिवर्तन (exogenous mutation) भी कहते हैं। ये रेडियोधर्मी पदार्थ, पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों, गामा किरणों आदि के कारण उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त कैफीन, मॉर्फीन, कैम्फर आदि रासायनिक पदार्थों तथा उच्च ताप आदि से भी उत्परिवर्तन हो जाते हैं। इन पदार्थों को उत्परिवर्तक (mutagens) कहते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा-नागासाकी नगरों पर जो परमाणु बम गिराए, उनके विकिरण के प्रभाव से वहाँ के निवासियों के जीन ढाँचों में हुए परिवर्तनो के कारण अब भी वहाँ विकलांग सन्ताने उत्पन्न हो रही है।

जैव विकास में उत्परिवर्तन का महत्त्व (Importance of mutation in evolution) – जीवधारियों में उत्परिवर्तन के फलस्वरूप विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार होती है। विभिन्नताएँ लाभदायक, हानिकारक या निरर्थक होती हैं। लाभदायक विभिन्नताओं की पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागति होती रहती है। हानिकारक एवं निरर्थक विभिन्नताएँ जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में नष्ट होती रहती हैं। उत्परिवर्तन के फलस्वरूप एक पूर्वज जाति से एक साथ मिलती-जुलती अनेक जातियाँ विकसित हो सकती हैंl 

    —–EXAM HACK FOR STUDENTS ——-

1– यूपी बोर्ड परीक्षा में सफलता के लिए सिलेबस को अच्छी तरह समझे और नियमित अभ्यास करें ।

2- पढ़ाई कि योजना बनाए जिसमे हर विषय के लिए समय हो समझो टॉपिक पर ज्यादा फॉक्स करे।

3- पेपर में पहले आसान सवाल हल करें सभी प्रश्नों के उत्तर दें बिन कोई छोड़ें। 

4- परीक्षा में व्हाइटनर(whitener) का उपयोग न करें केवल काला(black), नीला (blue) पेन का उपयोग करें । 

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